जानिए, भारतीय सिनेमा की ए,बी,सी,डी...

               

भारतीय सिनेमा के 100 गौरवशाली साल पूरे हो रहे हैं। इन 100 सालों में सिनेमा हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। अब मनोरंजन की कल्पना बिना फिल्मों के नहीं की जा सकती। पांच किश्तों में पढ़िए हिंदी सिनेमा का खूबसूरत सफरनामा।
इस फिल्म की वजह से जन्म हुआ बॉलीवुड का 1910 मे मुंबई में फिल्म ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ के प्रर्दशन के दौरान दर्शकों की भीड़ में एक ऐसा शख्स भी था जिसे फिल्म देखने के बाद अपने जीवन का लक्ष्य मिल गया। लगभग दो महीने के अंदर उसने शहर में प्रदर्शित सारी फिल्में देख डाली और निश्चय कर लिया वह फिल्म निर्माण ही करेगा। यह शख्स और कोई नहीं भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के थे।


बावर्ची बना बॉलीवुड की पहली हिरोइन

भारतीय सिनेमा जगत की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ का निर्माण दादा साहब फाल्के (मूल नाम धुंडिराज गोविन्द फाल्के) ने फाल्के फिल्म कंपनी के बैनर तले किया। फिल्म बनाने में उनकी मदद फोटोग्राफी उपकरण के डीलर यशवंत नाडरकर्णी ने की थी। फिल्म में राजा हरिशचंद्र का किरदार दत्तात्रय दामोदर, पुत्र रोहित का किरदार दादा फाल्के के बेटे भालचंद्र फाल्के जबकि रानी तारामती का किरदार रेस्टोरेंट में बावर्ची के रूप में काम करने वाले व्यक्ति अन्ना सालुंके निभाया था।


500 लोगों ने किया काम, 15000 रुपए में बनी फिल्म
फिल्म के निर्माण के दौरान दादा फाल्के की पत्नी ने उनकी काफी सहायता की। इस दौरान वह फिल्म में काम करने वाले लगभग 500 लोगों के लिये खुद खाना बनाती थीं और उनके कपड़े धोती थीं। फिल्म के निर्माण में लगभग 15000 रुपए लगे जो उन दिनों काफी बड़ी रकम हुआ करती थी। फिल्म का प्रीमियर ओलंपिया थियेटर में 21 अप्रैल 1913 को हुआ जबकि यह फिल्म तीन मई 1913 में मुंबई के कोरनेशन सिनेमा में प्रर्दशित की गई। लगभग 40 मिनट की इस फिल्म को दर्शकों का अपार प्यार मिला। फिल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई।


भारत की पहली महिला अभिनेत्री और पहला डांस नंबर
फिल्म राजा हरिश्चंद्र की अपार सफलता के बाद दादा साहब फाल्के ने वर्ष 1913 में ‘मोहिनी भस्मासुर’ का निर्माण किया। इसी फिल्म के जरिये कमला गोखले और उनकी मां दुर्गा गोखले जैसी अभिनेत्रियों को भारतीय फिल्म जगत की पहली महिला अभिनेत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ था। इसी फिल्म में पहला डांस नंबर भी फिल्माया गया था। कमला गोखले पर फिल्माए इस गीत को दादा फाल्के ने नृत्य निर्देशित किया था।


हिट हुआ फाल्के का आइडिया, खुलने लगीं फिल्म कंपनियां
वर्ष 19।4 मे दादा फाल्के ने ‘राजा हरिश्रचंद्र’, ‘मोहिनी भस्मासुर’ और ‘सत्यवान सावित्री’ को लंदन में प्रर्दशित किया। इसी वर्ष आर वैकैया और आरएस प्रकाश ने मद्रास में पहले स्थायी सिनेमा हॉल गैटी का निर्माण किया। वर्ष 1917 में बाबू राव पेंटर ने कोल्हापुर में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी की स्थापना की वही जमशेदजी फरामजी मदन (जे.एफ मदन) ने एलफिंस्टन बाईस्कोप के बैनर तले कोलकाता में पहली फीचर फिल्म सत्यवादी राजा हरिश्रचंद्र का निर्माण किया।


बॉलीवुड का पहला डबल रोल, पहली सुपरहिट फिल्म
वर्ष 1917 मे प्रदर्शित दादा फाल्के की फिल्म ‘लंका दहन’ पहली फिल्म थी जिसमें किसी कलाकार ने दोहरी भूमिका निभाई थी। अन्ना सांलुके ने इस फिल्म में राम और सीता का किरदार निभाया था। इस फिल्म को भारतीय सिनेमा को पहली सुपरहिट फिल्म बनने का गौरव प्राप्त है। मुंबई के एक सिनेमा हॉल में यह फिल्म 23 सप्ताह तक लगातार दिखाई गयी थी। वर्ष 1918 में प्रर्दशित फिल्म कीचक वधम दक्षिण भारत मे बनी पहली फिल्म थी।


जब फिल्मी पर्दा बन गया मंदिर
वर्ष 1919 में प्रदर्शित दादा फाल्के की फिल्म ‘कालिया मर्दन’ महत्वपूर्ण फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म में दादा फाल्के की पुत्री मंदाकिनी फाल्के ने कृष्णा का किरदार निभाया था। लंका दहन और कालिया मर्दन के प्रर्दशन के दौरान श्रीराम और श्री कृष्ण जब पर्दे पर अवतरित होते थे तो सारे दर्शक उन्हें दंडवत प्रणाम करने लगते। वर्ष 1920 मे आर्देशिर इरानी ने अपनी पहली मूक फिल्म नल दमयंती का निर्माण किया। फिल्म में पेटनीस कूपर ने मुख्य भूमिका निभाई थी।


शुरु हुआ कमर्शियल सक्सेस का दौर

1920 का दशक फिल्मों का निर्माण व्यवसायिक रूप से सफलता प्राप्त करने के लिये होने लगा। वर्ष 1921 में प्रर्दशित फिल्म भक्त विदुर कोहीनूर स्टूडियो के बैनर तले बनायी गयी एक सफल फिल्म थी। इसी वर्ष 1921 में प्रदर्शित फिल्म ‘द इंग्लैंड रिटर्न’ पहली सामाजिक हास्य फिल्म साबित हुयी। फिल्म का निर्देशन धीरेन्द्र गांगुली ने किया था। इस वर्ष प्रर्दशित फिल्म ‘सुरेखा हरन’ से बतौर अभिनेता राजाराम वानकुदरे शांताराम (व्ही शांताराम) ने अपने सिने करियर की शुरूआत की थी।


पहला स्टार, सेंसर बोर्ड की आपत्ति और पहला पोस्टर
वर्ष 1922 मे प्रर्दशित जेजे मदन निर्देशित फिल्म पति भक्ति को टिकट खिड़की पर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। फिल्म की सफलता ने अभिनेता पेटनीस कूपर स्टार बन गये। यह पहली फिल्म थी जहां सेसंर बोर्ड ने फिल्म पर अपनी आपत्ति जताते हुए इस फिल्म के एक गाने को हटाने की मांग की थी। बाबू राव पेंटर निर्मित और वर्ष 1923 में प्रदर्शित फिल्म सिंघद पहली फिल्म थी जिसमे आर्टिफिशियल लाईट का इस्तेमाल किया गया था। इस फिल्म में व्ही शांताराम ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इसी वर्ष पहला सिनेमा पोस्टर बाबू राव पेंटर ने अपनी फिल्म ‘वत्सला हरन’ के लिये छपवाया था।


पहली महिला निर्देशक
वर्ष 1926 में प्रर्दशित फिल्म ‘बुलबुले’ परिस्तान पहली फिल्म थी जिसका निर्देशन महिला ने किया था। बेगम फातिमा सुल्ताना इस फिल्म की निर्देशक थीं। फिल्म में जुबैदा, सुल्ताना और पुतली ने मुख्य भूमिका निभाई थीं। इसी वर्ष आर्देशिर इरानी ने इंपेरियल फिल्म की स्थापना की। लाहौर में पंजाब फिल्म कॉरपोरेशन की स्थापना भी इसी वर्ष की गयी।


और वो पहला देवदास...
1928 में प्रदर्शित शरत चंद्र चटोपाध्याय के उपन्यास देवदास पर पहली बार फिल्म देवदास का निर्माण किया गया। फन्नी बरूआ, तारकबाला और निहारबाला और मिस पारूल इस फिल्म में मुख्य भूमिका मे थे। फिल्म का निर्देशन नरेश मित्रा ने किया था। इसी वर्ष पृथ्वीराज कपूर ने अपने सिने करियर की शुरूआत मुंबई में इंपीरियल फिल्म कंपनी से की। इसी वर्ष प्रर्दशित फिल्म ‘विश्वमोहिनी’ ऐसी फिल्म थी जिसमे किसी अभिनेत्री ने तिहरी भूमिका की। गौहर ने इस फिल्म में तिहरी भूमिका की थी।


गौहर का जादू, तस्वीर वाली माचिस हुई हिट

उस दौर की चर्चित अभिनेत्री गौहर इतनी अधिक चर्चित हुईं कि उनकी तस्वीर जब माचिस की एक डिब्बी पर छपने लगी तब लोग वही माचिस खरीदने लगे और उनकी तस्वीर काटकर अपनी कमीज की उपर वाली जेब में रखने लगे। ऐसा लोग इसलिए करते थे कि गौहर की तस्वीर उनके सीने से लगी रहे। वहीं अभिनेत्री जुबैदा एक राज परिवार से आयी थीं। उनकी खूबसूरती लोग देखते नहीं थकते थे। यही वजह की कि जब बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ की तैयारी होने लगी तो आर्देशिर ईरानी ने उन्हें अपनी फिल्म में अभिनय का अवसर दिया।


और जब बोल पड़ी फिल्में...

14 मार्च 1931 को भारतीय सिनेमा जगत की पहली सवाक फिल्म ‘आलम आरा’ पदर्शित हुई। चालीस हजार रूपए में बनी आर्देशिर इरानी निर्मित इस फिल्म का प्रदर्शन सर्वप्रथम मुबंई के मैजेस्टिक सिनेमा में किया गया। पृथ्वीराज कपूर, जहांआरा और जुबैदा जैसे सितारों से सजी इस फिल्म में 7 गाने थे। पहले संगीतकार फिरोज साह मिस्त्री के निर्देशन में वजीद मोहम्मद खान की आवाज में पहला गाना दे दे खुदा के नाम पर रिकॉर्ड किया गया। मदन थियेटर के बैनर तले जेजे मदन निर्देशित दूसरी सवाक फिल्म ‘शीरी फरहाद’ 30 मई 1931 को प्रर्दशित हुयी। इस फिल्म में कुल 18 गीत थे।


पहली सिल्वर जुबली

मराठी फिल्म श्याम सुंदर(1932) ने सबसे पहले सिल्वर जुबली मनायी थी। दादा साहब तोरणे निर्मित और भालजे पेडरकर निर्देशित इस फिल्म ने मुंबई के वेस्ट इंड सिनेमा में 27 सप्ताह दिखाई गयी। मदन थियेटर के बैनर तले बनी फिल्म इंदौरसभा (1932) में सर्वाधिक 71 गाने थे। इसी साल प्रदर्शित न्यू थियेटर की फिल्म मोहब्बत के आंसू से कुंदन लाल सहगल ने बतौर अभिनेता कदम रखा।


बॉलीवुड का सबसे लंबा किस


साल 1933 में प्रदर्शित अंग्रेजी फिल्म ‘कर्म’ में देविका रानी ने हिमांशु राय के साथ लगभग चार मिनट तक लिप टू लिप दृश्य देकर उस वक्त तहलका मचा दिया। ये आज भी बॉलीवुड का सबसे लंवा किसिंग सीन माना जाता है। इसी वर्ष मुंबई में पहला एयर कंडीशन सिनेमा हाल रीगल और वाडिया मूवीटोन कंपनी की स्थापना की गयी। इसी साल प्रदर्शित फिल्म यहूदी की लड़की से सचिन देव बर्मन ने पार्श्र्वगायक और पंकज मल्लिक ने संगीतकार के रूप में अपनी पारी शुरू की।


हिन्दी फिल्मों की पहली ड्रीम गर्ल
देविका रानी के साथ शादी के बाद हिमांशु राय ने साल 1934 में बॉम्बे टॉकीज बैनर की स्थापना की। इस बैनर तले बनी पहली फिल्म ‘जवानी की हवा’ में देविका रानी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। हिन्दी फिल्मों की पहली स्वप्न सुंदरी ड्रीम गर्ल देविका रानी को कहा जाता है।


बॉलीवुड का पहला फ्लैशबैक
पीसीबरूआ और जमुना अभिनीत वर्ष 1934 में प्रदर्शित फिल्म ‘रुपलेखा’ में पहला फलैशबैक फिल्माया गया। इसी साल आर्देशिर ईरानी ने पहली अंग्रेजी फिल्म ‘नूरजहां’ का निर्माण किया। देवकी बोस के निर्देशन में बनी बंगला फिल्म ‘सीता’ को वेनिस फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया। पहली कन्नड़ फिल्म सती सुलोचना भी इसी वर्ष प्रदर्शित हुई। इसी साल मोतीलाल ने शहर का जादू और चंद्रमोहन ने अमृत मंथन से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा था।


शुरू हुआ पार्श्वगायन
नितिन बोस के निर्देशन में साल 1935 में प्रदर्शित फिल्म ‘धूपछांव’ से हिंदी फिल्मों में पार्शगायन की शुरूआत हुई। मैं खुश होना चाहूं गाना पारूल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति की आवाज में फिल्माया गया। इसी साल तलाशे हक से नरगिस की मां जद्दन बाई और ‘जवानी की हवा’ से सरस्वती देवी को संयुक्त रूप से पहली महिला संगीतकार बनने का गौरव प्राप्त हुआ।


बॉलीवुड की पहली गोल्डन जुबली
प्रभात फिल्म्स के बैनर तले दामले और फतेह लाल अभिनीत वर्ष 1936 में आयी ‘संत तुकाराम’ ने बॉक्स ऑफिस पर पहली गोल्डन जुबली मनायी। वेनिस फिल्म फेस्टिबल में बेस्ट फिल्म का पुरस्कार जीतने वाली यह पहली भारतीय फिल्म थी। वर्ष 1937 में आर्देशिर इरानी ने पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या’ और वर्ष 1938 में दूसरी रंगीन फिल्म ‘मदर इंडिया’ बनायी जिसने टिकट खिड़की पर लगभग 32 सप्ताह चलने का रिकॉर्ड बनाया।


दादा साहेब फाल्के की आखिरी फिल्म

वर्ष 1937 में प्रदर्शित फिल्म ‘गंगावतरण’ दादा फाल्के के सिने करियर की अंतिम फिल्म साबित हुई। वर्ष 1938 में आर्देशिर ईरानी इंडियन मोशन फिल्म्स प्रोड्यूसर एसोसिएशन की स्थापना कर अध्यक्ष बने। वर्ष 1938 प्रदर्शित फिल्म ‘बहादुर किसान’ से भगवान दादा के बतौर निर्देशक, ग्रामोफोन सिंगर से जोहरा बाई अंबाला वाली ने पार्श्र्वगायिका अपने करियर की शुरूआत की। इसी वर्ष पहली मलायलम फिल्म बालान रिलीज हुयी।


मीना कुमारी, प्रदीप और नूरजहां की शुरूआत

वर्ष 1939 में एसएस वासन ने मद्रास में जैमनी स्टूडियो की स्थापना की। इसी साल प्रदर्शित पंजाबी फिल्म ‘गुल ए बकावली’ से मल्लिका तरन्नुम नूरजहां ने पार्श्व गायिका और लेदरफेस से बतौर बाल कलाकार मीना कुमारी ने अपने करियर की शुरूआत की। इसी वर्ष ‘कंगन’ से कवि प्रदीप ने बतौर गीतकार अपने करियर का आगाज किया।


पहली देशभक्ति फिल्म
निर्देशक ज्ञान मुखर्जी की 1940 में प्रदर्शित फिल्म ‘बंधन’ संभवत पहली फिल्म थी, जिसमें देश प्रेम की भावना को रूपहले परदे पर दिखाया गया था। कवि प्रदीप रचित चल चल रे नौजवान के बोल वाले गीत ने आजादी के दीवानों में एक नया जोश भरने का काम किया। इसी वर्ष प्रदर्शित फिल्म प्रेम नगर से संगीत सम्राट नौशाद ने अपने करियर का आगाज किया। इसी दशक में क्षेत्रीय भाषाओं में भी बड़ी संख्या में फिल्में बनने लगीं।


चालीस का दशक रहा खास
दिलीप, राज, देवानंद की त्रिमूर्ति तथा लता, रफी, मुकेश, किशोर, आशा और कई महान पार्श्वगायकों के उदय के अलावा आर.के.फिल्म्स, नवकेतन, राजश्री समेत कई प्रोडक्शन हाउस के आने के साथ ही चालीस के दशक में भारतीय सिनेमा के साथ नया आयाम जुड़ा। यही वह दौर था जब उत्तम कुमार और एनटीरामाराव जैसे महानायक, सदी के खलनायक प्राण, जुबली स्टार राजेंद्र कुमार, ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी, बेपनाह हुस्न की मल्लिका मधुबाला और नरगिस ने अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा। इस दौर में उभरे गुरूदत्त, के.आसिफ., कमाल अमरोही, चेतन आंनद जैसे फिल्मकार और शंकर-जयकिशन, सचिन देव बर्मन, खय्याम, शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे गीतकारों ने भारतीय सिनेमा को अपनी कला से समृद्ध किया।


जब पर्दे पर हीरोइन नहाते नजर आई

वर्ष 1941 में केदार शर्मा के निर्देशन मे बनी ‘चित्रलेखा’ प्रदर्शित हुयी। भगवती चरण वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा पर बनी इस फिल्म में मेहताब पर फिल्माया स्नान दृश्य काफी चर्चित हुआ था। भारत भूषण की यह पहली फिल्म थी। वर्ष 1963 में केदार शर्मा ने इस फिल्म की रीमेक बनाई जिसमें मीनाकुमारी ने चित्रलेखा की भूमिका निभाई थी।


रफी और लता के सुरों का आगाज
आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने पहली बार 1942 में पंजाबी फिल्म गुल बलोच के लिए गायिका जीनत बेगम के साथ युगल गीत सोनिये नी हीरिए नी गाया। इसी वर्ष स्वर साम्राज्ञी लता मंगेश्कर ने किटी हसाल के लिये अपना पहला गाना गाया और फिल्म पहली मंगलगौर में अभिनय भी किया।


196 हफ्ते चली ‘किस्मत’, लता ने देखी 50 बार
वर्ष 1943 में प्रर्दशित अशोक कुमार अभिनीत बॉम्बे टॉकीज की फिल्म किस्मत ने कोलकाता के रॉक्सी थियेटर सिनेमा हॉल में लगतार 196 सप्ताह तक चलने का रिकॉर्ड बनाया। कहा जाता है कि फिल्म में कवि प्रदीप का लिखा गीत आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है दूर हटो ए दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है जैसे ही बजा सभी दर्शक अपनी सीट से उठकर खड़े हो गये और गाने की समाप्ति तक ताली बजाते रहे। फिल्म की समाप्ति के बाद इसे दोबारा दिखाया गया। फिल्म को लेकर एक अनोखी बात यह है कि स्वर कोकिला लता मंगेश्कर ने इसे लगभग 50 बार देखा। फिल्म मे कॉमेडी किंग महमूद ने भी अभिनय किया था।


जब महात्मा गांधी ने देखी फिल्म
वर्ष 1942 में वी शांताराम ने मुंबई में राजकमल फिल्म स्टूडियो की स्थापना की और इसके बैनर तले वर्ष 1943 में पहली डायमंड जुबली फिल्म शकुंतला का निर्माण किया। इसी वर्ष प्रर्दशित महबूब खान की फिल्म तकदीर से नरगिस ने, डांसिग क्वीन कुक्कू ने अरब का सितारा से फिल्म इंडस्ट्री मे कदम रखा। इसी वर्ष आयी रामराज्य एकमात्र फिल्म थी जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था। इसी वर्ष शशिधर मुखर्जी ने फिल्मिस्तान स्टूडियो की स्थापना की।


ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार की एंट्री और फाल्के की विदाई
अभिनय सम्राट दिलीप कुमार को फिल्मों में लाने का श्रेय देविका रानी को जाता है। अमय चक्रवर्ती के निर्देशन में बनी दिलीप कुमार की पहली फिल्म वर्ष 1944 में प्रर्दशित हुयी। वर्ष 1944 में प्रदर्शित रतन में अपने संगीतबद्ध गीत अंखिया मिला के जिया भरमा के चले नहीं जाना की कामयाबी के बाद नौशाद 25000 रुपये पारश्रमिक लेने लगे। इसी वर्ष सिनेमा जगत के जनक दादा साहब फाल्के ने 16 फरवरी को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।


ऐसे हुई देवानंद-गुरुदत्त की दोस्ती
वर्ष 1945 में प्रदर्शित फिल्म हम एक हैं से देवानंद ने बतौर अभिनेता और गुरूदत्त ने बतौर कोरियोग्राफर अपने करियर की शुरूआत की। ऐसा कहा जाता है कि फिल्म निर्माण के दौरान एक धोबी की दुकान पर कमीज की लेनदेन को लेकर दोनों की दोस्ती हुयी थी।


कांस फिल्म फेस्टिवल में भारतीय फिल्म
1946 में प्रदर्शित फिल्मीस्तान की फिल्म एट डेज से हिंदी फिल्मो में बतौर संगीतकार एस डी बर्मन और भक्त प्रहलाद से गीता दत्त ने पार्श्र्वगायिका के रूप में अपनी शुरूआत की। चेतन आनंद निर्देशित पहली फिल्म नीचा नगर से कामिनी कौशल ने बतौर अभिनेत्री अपनी शुरूआत की। यह पहली भारतीय फिल्म थी जिसे कांस फिल्म फेस्टिवल मे पुरस्कार मिला था।


राजकपूर, किशोर कुमार और प्राण की एंट्री
वर्ष 1947 में प्रदर्शित फिल्म ‘नीलकमल’ से बतौर मुख्य अभिनेता राजकपूर ने अपने सिने करियर की शुरूआत की। इसी वर्ष फिल्म ‘दर्द’ से बतौर गीतकार शकील बदायूंनी ने अपने सिने करियर की शुरूआत की थी। इस फिल्म में उनका रचित गीत अफसाना लिख रही हूं आज भी बेहद लोकप्रिय है। पारिवारिक फिल्मों के निर्माण में महारत करने वाली प्रोडक्शन कंपनी राजश्री प्रोडक्शन की स्थापना ताराचंद बड़जात्या ने इसी साल की थी। वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म ‘जिद्दी’ से बतौर पार्श्र्व गायक किशोर कुमार और हिंदी फिल्मों में बतौर खलनायक प्राण ने अपने करियर की शुरूआत की थी।


आरके फिल्म्स का आगाज
वर्ष 1948 में राजकपूर ने महज 24 वर्ष की उम्र में आरके फिल्मस की स्थापना की और पहली फिल्म आग का निर्माण किया। इसी वर्ष प्रदर्शित एसएस वासन की फिल्म ‘चंद्रलेखा’ पहली फिल्म थी जिसे भारत की सभी भाषाओं में सबटाइटल्स के साथ रिलीज किया गया था। इस फिल्म का तलवार युद्ध आज भी सबसे लंबा फाइट सीन माना जाता है।


जब दिलीप-राजकपूर आए साथ
वर्ष 1949 में प्रदर्शित महबूब खान की प्रेम त्रिकोण पर बनी फिल्म ‘अंदाज’ में दिलीप कुमार और राजकपूर ने पहली और आखिरी बार एक साथ काम किया था। नरगिस इस फिल्म का तीसरा कोण थीं। इसी वर्ष प्रदर्शित कमाल अमरोही की फिल्म ‘महल’ से हिंदी फिल्मों में हॉरर और सस्पेंस ने अपनी जगह बनाई। अशोक कुमार अभिनीत इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने नायिका मधुबाला और आयेगा आने वाला गीत से गायिका लता मंगेशकर को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया। इस वर्ष देवानंद ने अपने भाई चेतन आंनद के साथ मिलकर नवकेतन फिल्म्स की स्थापना की। वर्ष 1949 में रूपहले पर्दे पर आई राजकपूर की फिल्म ‘बरसात’ भारतीय सिनेमा जगत की महत्वपूर्ण फिल्मों में एक है। इसी वर्ष प्रदर्शित फिल्म करवट बीआj चोपड़ा ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा था।


पहली ए सर्टीफिकेट फिल्म
वर्ष 1950 मे देवानंद ने नवकेतन फिल्म्स के बैनर तले अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया। इसी वर्ष प्रदर्शित आकाश चित्रा की फिल्म हंसते आंसू पहली हिंदी फीचर फिल्म थी जिसे ए र्सटिफिकेट दिया गया। इसी वर्ष शोभना समर्थ ने अपनी दो पुत्री नूतन और तनुजा को लेकर ‘हमारी बेटी’ बनायी। यहां गौर करने वाली बात यह है कि नूतन पहली मिस इंडिया है जिसने फिल्मों में अभिनय किया।


सेंसरशिप और फिल्म पत्रकारिता की शुरूआत
1951 में सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स की स्थापना हुई। इसी साल गुरुदत्त ने फिल्म ‘बाजी’ से अपने डायरेक्शन करियर की शुरूआत की। फिल्म पत्रिका स्क्रीन भी इसी साल पहली बार छापी गई। 1952 में पहली बार इंटरनेशनल इंडियन फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया गया। इसी साल बिमल रॉय ने अपना प्रोडक्शन हाउस खोला और फिल्मफेयर मैगजीन का प्रकाशन शुरू हुआ। इस साल सोहराब मोदी की झांसी की रानी, रित्विक घटक की नागरिक और आर. कृष्णन की पराशक्ति प्रमुख फिल्में रहीं।

1953 में आई सोहराब मोदी की फिल्म ‘झांसी की रानी’ पहली फिल्म थी जो कलर में शूट की गई और अंग्रेजी और हिंदी में एक साथ रिलीज की गई। इसी साल रिलीज हुई बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ को कांस फिल्म समारोह में सोशल प्रोग्रेस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इस साल से सेंसरशिप के नियमों में भी बदलाव होने लगे। इसी साल से फिल्मफेयर अवॉर्ड्स का वितरण भी शुरू किया गया। इस साल राजकपूर की फिल्म ‘आह’ भी रिलीज हुई।


सोवियत संघ में छाया बॉलीवुड

साल 1954 में पीके आत्रे की फिल्म ‘श्यामची आई’(1953) को प्रेसिडेंट गोल्ड मेडल से नवाजा गया। इसी साल सोवियत संघ में भारतीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया जहां राजकपूर की फिल्म ‘आवारा’ बड़ी हिट साबित हुई। इसी साल ख्वाजा अब्बास अहमद की फिल्म ‘मुन्ना’ रिलीज हुई जो बिना गानों की दूसरी फिल्म थी।


भारतीय सिनेमा की पहली ट्रायलॉजी
सत्यजीत रे की ‘पाथेर पांचाली’ भारतीय फिल्म इतिहास की पहली ट्रायलॉजी (तीन फिल्मों का समूह) थी जिसमें एक गरीब ब्राम्हण लड़के अपु की कहानी थी। ये फिल्म 1955 में रिलीज हुई। वी शांताराम की झनक झनक पायल बाजे भी इसी साल रिलीज हुई जो पूरी तरह भारतीय तकनीशियनों द्वारा बनाई गई पहली टेक्नीकलर फिल्म थी। इस साल राजकपूर की फिल्म श्री 420 इस साल रिलीज हुई। इसके अलावा ‘मि एंड मिसेज 55’, ‘मुनीमजी’ और दिलीप कुमार स्टारर ‘देवदास’ भी साल 1955 की खास फिल्में मानी जाती हैं। साल 1956 में देवानंद की ‘सीआईडी’ और ‘फंटूश’ कामयाब फिल्में साबित हुईं। राजकपूर और नर्गिस की हिट जोड़ी की भी इस साल एक फिल्म आई। फिल्म का नाम था ‘चोरी-चोरी’।


जब आई मदर इंडिया, प्यासा और नया दौर
साल 1957 हिंदी सिनेमा के लिए बेहद खास रहा। इस साल महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया रिलीज हुई जो उस दशक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म तो थी ही साथ ही ऑस्कर के लिए फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटगरी में नॉमीनेट होने वाली पहली भारतीय फिल्म बनी। इसी साल दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला स्टारर फिल्म ‘नया दौर’ भी रिलीज हुई जो क्लासिक मानी गई। साल 1957 में एक और फिल्म रिलीज हुई जो बॉलीवुड के लिए मील का पत्थर साबित हुई। फिल्म थी गुरुदत्त की ‘प्यासा’ जो न सिर्फ क्लासिक मानी गई बल्कि इसे टाइम मैग्जीन ने विश्व की 100 सबसे बेहतरीन फिल्मों में शुमार किया है। इसके अलावा इस साल की ‘दो आंखें बारह हाथ’, ‘पेइंग गेस्ट’ जैसी फिल्में भी लाजवाब थीं। साल 1958 में ‘मधुमती’, चलती का नाम गाड़ी, यहूदी, फागुन, हावड़ा ब्रिज और दिल्ली का ठग जैसी फिल्में काफी चर्चा में रही वहीं अनाड़ी, पैगाम, नवरंग, धूल के फूल जैसी फिल्में 1959 की खास फिल्में रहीं।


मुगल-ए-आजम जैसी कोई नहीं
साल 1960 में रिलीज हुई ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगले आजम’, इस फिल्म में लीड रोल में थे दिलीप कुमार और मधुबाला। के आसिफ निर्देशित इस फिल्म को बनने में 10 सालों का वक्त लगा था। ये फिल्म अब भी बॉलीवुड की सबसे मशहूर और बेहतरीन फिल्मों में से एक मानी जाती है। फिल्म को 2004 में रंगीन कर पेश किया गया। इसी साल बरसात की रात, कोहीनूर, चौदवी का चांद, जिस देश में गंगा बहती है, दिल अपना और प्रीत पराई जैसी फिल्मों ने भी बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की।


रोमांटिक फिल्मों का स्वर्णिम काल
भारतीय सिनेमा जगत में 1961-1970 के दशक को जहां एक ओर रोमांटिक फिल्मों के स्वर्णिम काल के रूप मे याद किया जायेगा, वहीं दूसरी ओर इसे हिन्दी सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना, सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, जुबली कुमार उर्फ राजेन्द्र कुमार, .हीमैन धमेंद्र और जंपिक जैक जितेंद्र के इंडस्ट्री में आगमन का दशक भी कहा जायेगा।


राष्ट्रपति ने कहा बनाओ भोजपुरी फिल्म
वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘जंगली’ से शम्मी कपूर चाहे कोई मुझे जंगली कहे गीत गाकर याहू स्टार बने वही बतौर अभिनेत्री सायरा बानू की यह पहली फिल्म थी। वर्ष 1962 में गुरूदत्त की कालजयी ‘साहब बीबी और गुलाम’ प्रदर्शित हुयी। वर्ष 1963 में प्रदर्शित विमल राय की फिल्म ‘बंदिनी’ के लिये गुलजार ने पहला गीत मेरा गोरा अंग लेई ले लिखा। इसी साल देश के प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद की गुजारिश पर प्रसिद्ध फिल्म निर्माता विश्वनाथ शाहाबादी ने पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबो’ का निर्माण किया।


हसरत की प्रेमिका का खत बन गया गीत
वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगम’ इस दशक की सर्वाधिक सुपरहिट फिल्म थी। राजकपूर निर्मित यह पहली कलर फिल्म थी साथ ही पहली बार किसी फिल्म को यूरोप में फिल्माया गया था। फिल्म से जुड़ा रोचक तथ्य है कि गीतकार हसरत जयपुरी अपने युवावस्था में राधा नामक एक युवती से प्रेम किया करते थे और उन्होंने एक कविता लिखी थी जिसके बोल.ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज नही होना..लिखा। अलबत्ता वह इस पत्र को राधा को नहीं दे सके लेकिन उनका खत गाने के रूप मे इस फिल्म में फिल्माया गया।


बॉलीवुड की पहली मल्टीस्टारर और जुबली कुमार
वर्ष 1965 मे प्रदर्शित बीआर चोपड़ा निर्मित और यश चोपड़ा निर्देशित ‘वक्त’ को पहली मल्टीस्टारर फिल्म कहा जाता है। वर्ष 1965 में देवानंद ने अपनी पहली कलर फिल्म गाईड का निर्माण किया। वर्ष 1966 में राजेश खन्ना ने अपने करियर की शुरूआत चेतन आंनद की फिल्म ‘आखिरी खत’ से की। वर्ष 1963 से 1966 तक राजेंद्र कुमार की लगातार छह फिल्में मेरे महबूब, जिन्दगी, संगम, आई मिलन की बेला, आरजू और सूरज ने सिनेमाघरों में सिल्वर जुबली या गोल्डन जुबली मनायी। इसी को देखते हुये उनके प्रशंसको ने उनका नाम जुबली कुमार रख दिया था।


प्रधानमंत्री से मिली फिल्म प्रेरणा
वर्ष 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की समाप्ति के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देश में किसान और जवान की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुये जय जवान जय किसान का नारा दिया और मनोज कुमार से इसपर फिल्म बनाने की पेशकश की। वर्ष 1967 में मनोज कुमार ने इसपर अपनी पहली निर्देशित फिल्म ‘उपकार’ बनायी।

जितेंद्र यूं बने जंपिंग जैक
फिल्म ‘फर्ज’ में मस्त बहारों का मैं आशिक पर डांस कर जितेंद्र जंपिग जैक कहलाये। इसी वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘ज्वैल थीफ’ में भारतीय सिनेमा के फोर्थ पिलर अशोक कुमार ने नेगेटिव किरदार निभाकार दर्शकों को चौका दिया। इसी वर्ष सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पहला राष्ट्रीय पुरस्कार नरगिस को रात और दिन के लिये दिया गया।

तीन सितारों का साल और पहला फाल्के अवॉर्ड
वर्ष 1968 में सिनेमा जगत के इतिहास की सबसे लोकप्रिय हास्य फिल्म पड़ोसन में महमूद ने निगेटिव किरदार निभाकर दर्शकों को अचरज में डाल दिया। वर्ष 1969 में प्रदर्शित ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने रूपहले पर्दे पर एंट्री की थी। वहीं इसी वर्ष बिहारी बाबू शत्रुध्न सिंहा ने भी ‘साजन’ में पहली बार एक छोटी भूमिका निभायी थी। वहीं शक्ति सामंत की फिल्म ‘आराधना’ से राजेश खन्ना के रूप में फिल्म इंडस्ट्री को अपना पहला सुपरस्टार मिला। इसी वर्ष भारतीय सिनेमा जगत की पहली ड्रीम गर्ल कही जाने वाली देविका रानी को पहला दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त हुआ।

राजकपूर की फ्लॉप फिल्म बन गई क्सासिक
वर्ष 1970 में राजकपूर ने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का निर्माण किया। बेहतरीन स्टोरी लाईन और राजकपूर समेत कई सितारों के होने के बावजूद यह फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह नकार दी गयी। यह अलग बात है कि बाद में इसे कालजयी फिल्म का दर्जा प्राप्त हुआ। भारतीय सिनेमा के इतिहास में यह दूसरी सर्वाधिक लंबी फिल्म है। यह फिल्म चार घंटा 14 मिनट है। सबसे लंबी फिल्म एलोसी कारगिल है जो चार घंटा 25 मिनट की है।

14 साल में बनी पाकीजा!
वर्ष 1972 में चित्रलेखा जैसी सुंदर मीना कुमारी की 14 वर्षों में बनी पाकीजा प्रदर्शित हुई। लोग कहने लगे कमाल अमरोही दूसरी मुगले आजम बना रहे हैं। मीना कुमार की लाजवाब अदाकारी वाली इस फिल्म में राजकुमार के बोल गये संवाद आपके पैर देखे बहुत हसीन हैं जमीन पर मत रखियेगा मैले हो जाएंगे बहुत लोकप्रिय हुए।


वर्ष 1973 में प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘जंजीर’ की अभूतपूर्व सफलता ने अमिताभ को उनकी पहली सुपरहिट फिल्म का दीदार कराया। इसी साल शो मैन राजकपूर की टीनेज प्रेमकथा पर बनी ‘बॉबी’ आई। साल 1973 में ही आमिर खान ने बाल कलाकार के रूप में ‘यादों की बारात’ से अभिनय जीवन की शुरूआत की। वहीं ‘दाग’ से किंग ऑफ रोमांस यश चोपड़ा निर्देशक से निर्माता भी बन गए।
संजीव कुमार के नौ किरदार और शबाना को नेशनल अवॉर्ड

साल 1974 में ‘नया दिन नई रात’ में संजीव कुमार ने नौ अलग-अलग किरदार निभाकर दर्शकों को रोमांचित कर दिया। इसी साल रजनीगंधा से गोलमाल करने वाले अमोल पालेकर, जरीना बहाव, देश परदेस से टीना मुनीम, कुंआरा बाप से राजेश रौशन ने संगीतकार, अंकुर से शबाना आजमी और इसी फिल्म से श्याम बेनेगल ने निर्देशक के रूप मे शुरूआत की। शबाना को इस फिल्म के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।


जब आई ‘शोले’ की ‘आंधी’ और बहा भक्ति रस!
वर्ष 1975 में भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास की महान शाहकार शोले रिलीज हुई। गब्बर सिंह की दहाड़, जयशवीरू की दोस्ती, हेमा मालिनी की चुलबुली अदा, संजीव कुमार का संजीदा अभिनय, पंचम दा के महबूबा महबूबा जैसे फड़कते संगीत ने फिल्म को सदा के लिये अमर बना दिया। शोले मुंबई के मिनर्वा टॉकीज मे लगातार पांच साल दिखाई गयी थी। तीन करोड़ के बजट मे बनी पहली 70 एमएम फिल्म ने 15 करोड़ रूपये का शानदार व्यापार किया। इसी वर्ष डायमंड जुबली मनाने वाली ब्लॉकबस्टर धार्मिक फिल्म जय संतोषी मां और संजीव कुमार-सुचित्रा सेन की विवादस्पद फिल्म आंधी प्रदर्शित हुयी।

अफगानिस्तान में शूट हुई पहली फिल्म
साल 1975 में दक्षिण भारतीय फिल्मों के महानायक रजनीकांत ने तमिल फिल्म अपूर्वा रागरंगल से, रवि चोपड़ा ने जमीर से निर्देशक, वहीं नसीरउदीन शाह ने निशांत, स्मिता पटिल ने चरणदास चोर से अभिनय के क्षेत्र मे कदम रखा। फिरोज खान धर्मत्मा की शूटिंग के लिये अफगानिस्तान के खूबसरत लोंकेशनो पर गए। इससे पहले भारत की किसी भी फिल्म का वहां फिल्मांकन नहीं किया गया था।

मिथुन को मिला पहली फिल्म के लिए नेशनल अव

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Faculty of Education University of Delhi B.Ed Admission 2013

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